Umar badne pe kya hota hai- उम्र बढ़ने के मनोसामाजिक पहलू क्या है ?

 उम्र बढ़ने के मनोसामाजिक पहलू क्या है -


विकसित देशों में मनुष्य की आयुवृद्धि बहुत लंबी होती जा रही है जिसका कारण आर्थिक संपन्नता, अच्छा खाना, साफ पानी, रोगो का अच्छी तरह से उपचार, और अच्छे चिकित्सालय है, प्रारंभिक आयुवृद्धि धीरे धीरे होती है तथा उम्र के शुरुआती आदतों पर निर्भर रहती है जिसे रोका नहीं जा सकता तथा द्वितीय कारण बीमारी के कारण भी आयुवृद्धि होती है। मोटे तौर पर दुनिया भर में 1,00,000 से अधिक लोग उम्र संबंधी कारणों की वजह से मरते हैं।


मनुष्य में उम्र का बढ़ना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तन की एक बहुआयामी प्रकिया को दर्शाता है। उम्र का बढ़ना सभी मानव समाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो जैविक बदलाव को दर्शाता है लेकिन इसके साथ ही यह सामाजिक व सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाता है, किसी जीव तथा पदार्थ में समय के साथ इकट्ठे होने वाले परिवर्तनों को वृद्धावस्था या उम्र का बढ़ना कहते हैं। समय के साथ वृद्धावस्था के कुछ आयाम बढ़ते या फैलते हैं जबकि अन्यों में गिरावट आती है, सार्वभौमिक मानवीय अनुभव होने के बावजूद वृद्धावस्था का औपचारिक विश्लेषण सबसे पहले 1532 में मुहम्मद इब्न यूसुफ अल-हरावी द्वारा अपनी पुस्तक "ऐनुल हयात" में किया गया था जिसे मध्यकालीन चिकित्सा और विज्ञान की इब्स सिना अकादमी द्वारा प्रकाशित किया गया था यह पुस्तक बुढ़ापे और उससे संबंधित मुद्दे पर ही आधारित है।
कुछ शोधकर्ता बुढ़ापे को एक रोग मान रहे हैं, दरअसल जीवन में उम्र का बढ़ना न रोकें जा सकने वाला गुण है यह एक आनुवंशिक कार्यक्रम का परिणाम है, उम्र का बढ़ना एक सामाजिक प्रक्रिया है,

जीव विज्ञान, में बूढ़ा होना उम्र बढ़ने की एक प्रकिया या दशा है जीवकोषीय बुढ़ापा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पृथक कोशिकाएं कल्चर में बंटने की सीमित क्षमता का प्रदर्शन करती है जबकि जीवों की उम्र बढ़ने को "ओर्गेजेनिज्ल बुढ़ापा" कहते हैं। मनुष्य और अन्य जानवरों में जीवकोषीय बुढ़ापे को प्रत्येक कोशिका चक्रों में टेलीमेयर घटाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
उम्र बढ़ने की परिभाषा कुछ हद तक अस्पष्ट है।
वृद्धावस्था के प्रकार -
1. "सार्वभौमिक वृद्धावस्था" - उम्र बढ़ने के वे परिवर्तन जो अधिकतर सब लोगों में होते हैं।
2. "संभाव्य वृद्धावस्था" - उम्र बढ़ने के वे परिवर्तन जो कुछ लोगों में पाये जा सकते हैं। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ साथ कई लोगों में नहीं पाये जाते।
3. "कालनुक्रामिक वृद्धावस्था" यकीनन उम्र बढ़ने की सबसे सरल परिभाषा है और यह
4. ("सामाजिक वृद्धावस्था" - समाज की आकांक्षाएं कि बूढ़े होने पर लोगों को कैसा व्यवहार करना चाहिए
5. "जैविक वृद्धावस्था" - उम्र बढ़ने के साथ एक जीव की भौतिक दशा) से अलग पहचानी जा सकती है।
6. "आसन्न वृद्धावस्था" - उम्र आधारित प्रभाव जो अतीत के कारणों की वजह से आते हैं।
7. "विलंबित वृद्धावस्था" - उम्र के आधार पर अंतर जिनके कारणों का पता व्यक्ति के जीवन की शुरुआत में लगाया जा सकता है जैसे बचपन में पोलियोमाइलिटिस होना।

बुजुर्ग लोगों की आबादी के बारे में अनेक मतभेद रहे हैं कभी कभी इस आबादी का विभाजन युवा बुजुर्गों (65-74),प्रौढ बुजुर्गों (75-84 ), अत्याधिक बूढ़े बुजुर्गों ( 85+ ) के बीच किया जाता है‌। हालांकि इसमें समस्या यह है कि कालनुक्रामिक उम्र कार्यात्मक उम्र के साथ पूरी तरह से जुड़ी हुई नहीं है अर्थात ऐसा हो सकता है दो लोगों की आयु समान हो लेकिन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमताएं अलग हो, उम्र वर्गीकृत करने के लिए प्रदेश, देश, गैर सरकारी संगठन के पास विभिन्न तरीके हैं। समाज में वृद्ध लोगों की संख्या तथा अनुपात में वृद्धि को वृद्ध जनसंख्या कहते हैं। वृद्ध जनसंख्या के तीन संभावित कारण है - आप्रवास, लंबी जीवन प्रत्याशा, कम मृत्यु दर। वृद्धावस्था समाज पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है उनका अनुभव युवा लोगों के अनुभव से कहीं ज्यादा बेहतर होता है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि युवा लोग सबसे अधिक अपराध करते हैं और वे नयी प्रोघोगिकियो को विकसित करने और अपनाने और शिक्षा की जरूरत के लिए सामाजिक और राजनीतिक बदलाव करने के अधिक उत्सुक रहते हैं युवा लोगों के बजाय बुजुर्ग लोग समाज और सरकार से कुछ अलग चाहते हैं और अक्सर उनके सामाजिक मूल्य भी अलग होते हैं। क्योंकि उनके सोचने और समझने की क्षमता युवा लोगों से अधिक सक्षम और बेहतर होती है इसलिए कुछ जगहों कर युवाओं को वोट देने का अधिकार नहीं होता क्योंकि उनके सोचने और समझने की शक्ति बुजुर्गों की अपेक्षा कम होती है।

उम्र बढ़ने के ऐसे कौनसे कारण है जिनके कारण उम्र में वृद्धि होती है उन्हें निम्न सिद्धांतों के माध्यम से समझा जा सकता है जिसमें सबसे पहले
1. टेलोमेयर सिद्धांत -
2. त्रुटि संचय सिद्धांत - एक अवधारणा जिसके अनुसार उम्र बढ़ने का कारण सबूत जुटाने वाले तंत्र से बचने वाली सामयिक घटनाएं है जो धीरे धीरे आनुवंशिक कणों को नष्ट कर देती है।

3. हास सिद्धांत - एक बहुत ही सामान्य अवधारणा जिसके अनुसार उम्र बढ़ने के साथ होने वाले परिवर्तन समय समय पर होने वाली क्षत्रियों के साथ जुड़े हुए हैं। 4. पुनरूउत्पादक कोशिका चक्रीय सिद्धांत - उम्र का बढ़ना पुनरूउत्पादक हार्मोनों द्वारा विनियमित है जो कोशिका चक्र के माध्यम से विरोधी एकाधिक प्रभाव के रूप में क्रिया करते हैं, 5. संचयी अपशिष्ट सिद्धांत - उम्र बढ़ने का जैविक सिद्धांत जिसके अनुसार अपशिष्ट उत्पादों की कोशिकाएं उत्पन हो जाती है। 6. स्वप्रतिरक्षा सिद्धांत - उम्र बढ़ने का कारण स्वत बनने वाली प्रतिरक्षी है जो शरीर की कोशिकाओं पर हमला करते हैं उम्र बढ़ने के साथ जुड़ी अनेक बीमारियां जैसे एटो्फिफ इसी प्रकार की प्रतिरक्षा है। 7. वृद्धावस्था - घड़ी सिद्धांत - एक सिद्धांत जिसके अनुसार उम्र का बढ़ना घड़ी के साथ योजनाबद्ध क्रम के तहत होता है जो शरीर की तंत्रिका या एंडोक्रोइन प्रणाली के संचालन से बनता है। 8. क्षति संचय सिद्धांत - यह एक हालिया सिद्धांत है जो बताता है कि उम्र का बढ़ना "क्षत्रियों" के संचय के परिणामस्वरूप होता है। 9. क्रास - लिकेंज सिद्धांत - यह एक अवधारणा है कि परस्पर जुड़े हुए यौगिको के कारण उम्र बढ़ती है जो कोशिका की सामान्य क्रियाविधि में हस्तक्षेप करते हैं, 10. दैहिक उत्परिवर्तन सिद्धांत - एक जैविक सिद्धांत है कि शरीर की कोशिकाओं की आनुवंशिक अखंडता को नुकसान होता है जिसके कारण उम्र बढ़ती है। 11. विकासपरक सिद्धांत - वर्तमान, में उम्र बढ़ने के जैविक कारण अज्ञात है लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न प्रजातियों में उम्र बढ़ने की दर में परिवर्तनशीलता मौजूद हैं और यह मुख्य रूप से आनुवांशिकी पर आधारित है। उम्र बढ़ने के साथ ही हमारे शरीर में कुछ बदलाव आते हैं जो कि निम्न हैं -
जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है त्वचा की क्रांति ढलती रहती है जिन ऊतकों के कारण हमारी त्वचा में निखार व भरी पूर नजर आती है वो समय के साथ टूटने लग जाती है इसका परिणाम यह होता है कि शरीर पर झुर्रियां और बारीक बारीक रेखाएं उभर आती है,

बढ़ती उम्र का त्वचा पर प्रभाव -
1. जब आप उम्र के दूसरे दशक में होते हैं तो तब शरीर में ढेर सारे परिवर्तन होते हैं मसलन और हार्मोंस का उतार चढ़ाव शरीर को अंदर और बाहर से हिलाकर रख देता है।
2. उम्र के चालीसवे दशक में हार्मोन्स का स्तर तेजी से घट बढ़ जाता है इससे मांसपेशियों का नचीलापन, बोल्स रेस्पोरेशन होता है और कुल चर्बी में कमी आने लगती है जिससे त्वचा सूखी और पतली होने लगती है।
सफल वृद्धावस्था - सफल वृद्धावस्था की अवधारणा को 1950 के बाद खोजा गया और 1980 के दशक में यह लोकप्रिय हुई। बुढ़ापे से जुड़ा पिछला अनुसंधान उस सीमा तक पहुंचा जहां सेहत की अक्षमताओं जैसे मधुमेह या ऑस्टियोपोरोसिस को उम्र के लिए बिशेष रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है

सफल बुढापे के तीन प्रमुख घटक -

1. बीमारी या विकलांगता की कम संभावना -
2. शारीरिक कार्यात्मक क्षमता - वही व्यक्ति स्वस्थ और उज्जवल है जिसमें काम करने की क्षमता अधिक होती है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि युवा लोग थोड़ा सा काम करने के बाद थकान का अनुभव करते हैं,

3. जीवन के साथ सक्रिय जुडाव - सभी बुजुर्गों को तीन समूहों में विभाजित किया जाता है जिसमें सबसे पहले वो बुजुर्ग लोग आते हैं जो स्वयं को पर्याप्त रूप से ऊर्जावान और स्फूर्तिवान महसूस करते हैं और काम करना जारी रखते हैं सामाजिक नियमों का पालन करते हैं, द्वितीय समूह में वो लोग आते हैं जो भाड़े के लिए काम नहीं करते लेकिन स्वयं के व्यवसाय का आनंद लेते हैं, तृतीय समूह में वो लोग आते हैं जो कमजोर मानसिक वाले जो स्वयं के साथ व्यस्त हैं। बड़ी संख्या में लोग इन मानदंडों को पुरा करने वालों की तुलना में स्वयं को सफल बुढापे का प्रतिनिधि मानते हैं।
सफल बुढापे के आयाम -

1. सक्षम जीवन की लंबाई 2. अच्छा मानसिक स्वास्थ्य 3. उद्देश्यपरक सामाजिक समर्थन 4. स्वास्थ्य का अच्छा स्व - मूल्यांकन 5. चिकित्सक द्वारा 75 बर्ष की उम्र के बाद किसी प्रकार की स्वास्थ्य अक्षमता का मूल्यांकन न किया गया हो।
उम्र बढ़ने से अंतर्मुखता तक संक्रमण की एक प्रकिया होती है जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक कनेक्शन को नुक़सान होता है।
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